Ek Wajah Chahiye (एक वजह चाहिए)Gaurav Kataria6 hours ago2 min read © All Copyrights of this Artwork are reserved © मैं ज़िंदा तो हूँ, मगर यह ज़िन्दगी नहीं।यह दिल भी ज़िंदा है, मगर यह ज़िंदादिल नहीं।घुट रहा है मेरा दम, इन मदहोशी भरी हवाओं में,बस इस मदहोशी को खोने की एक वजह चाहिए,मुझे फिर से जीने की एक वजह चाहिए।मैं हंसना तो चाहता हूँ, और महसूस भी करना चाहता हूँ, उस मुस्कान को,जो कभी, किसी के लबों पर नहीं दिखी,वही मुस्कान, वही ख़ुशी, जिसके आगे ज़िन्दगी भी छोटी लगे,बस उसी तरह मुस्कुराने की एक सही वजह चाहिए,मुझे फिर से जीने की एक वजह चाहिए। मैं चखना चाहता हूँ उस बहती धारा को,जिसमें नमक का कोई स्वाद नहीं,जिसमें जुबां का भी कोई काम नहीं,दूध से भी सफ़ेद, है रंग उसका, मगर उसमें कोई मलाई नहीं।बस उस रस को चखने की एक वजह चाहिए।मैं सूंघना चाहता हूँ उस महक को, जो कभी मुरझाती नहीं।यह कोई अत्ततर का तेल नहीं, बल्कि लफ़्ज़ों की मौज हैं।उन्हीं लफ़्ज़ों के महकते हुए बागीचों में - कुछ पल ज़िन्दगी की साँसे लेना चाहता हूँ। क्यों की इस दिल को धड़कने की एक वजह चाहिए।खोज रहा हूँ एक सिरा, उस डोर का,जो किसी कटी हुई पतंग का है,दूर कहीं नीले आसमान के उस पार…उस डोर को पकड़ कर, मैं भी ऊँचे आसमान में उड़ना चाहता हूँ,मगर इन आसमानो की ऊंचाइयों को छूने की –एक सही वजह चाहिए।अब यह दौलत क्या है? शोहरत क्या है?क्या में आमिर हूँ? या फिर गरीब?बस मैं जो भी हूँ… जितना भी हूँ -पूरी तरह से, अधूरा हूँ!अब तो में फूट-फूट कर रोना चाहता हूँ,और अपने आंसुओं का एक, समंदर बनाना चाहता हूँ।उस समंदर में खारापन तो है, मगर कोई किनारा नहीं।और उसी खारे पानी की बारिश में मैं भीगना चाहता हूँ। बस एक दफा खुल के रोना चाहता हूँ।मगर उस तरह रोने की भी एक वजह तो चाहिए!मुझे मालुम है, मेरी इन नज़मोिं में कोई हक़ीक़त नहीिं,बस जैसे एक ख्वाब है!मगर इन ख्वाबोिं को मैं जीना चाहता हूँ, और बस -चुप रहना चाहता हूँ!अब मैं सोना चाहता हूँ,अपनी इन पलकोिं को मूूँद कर -एक और ख्वाब देखना चाहता हूँ!मगर इन पलकोिं को मूिंदने की एक वजह तो चाज़हए?बस अब मुझे अलविदा कहने की एक वजह चाज़हए।
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